Sunday, 25 June 2017

भारत की विलुप्त होती बोलियां और भाषाएं

                        


                               भारत की विलुप्त होती बोलियां और भाषाएं




भाषा समाज की रीढ़:- बोली सिर्फ बोली जाती है भाषा लिखी भी जाती है. बोलने के लिए बोली की ध्वनियोंके उच्चारण का अभ्यास पर्याप्त नहीं माना जाता. बोली का अपना एक लहजा भी होता है जिसे बोली बोलनेवालों के साथ रहकर ही सीखा जा सकता है. इसी तरह लिखने के लिए भी भाषा के लिपिचिह्नों के अंकन कीविधि सीखनी पड़ती है. बोलियों में प्रायः लोक साहित्य मुखरित होता है और भाषाओं में नागर साहित्य लिखाजाता है. लिखना का मतलब आदर्श हिंदी शब्दकोश में किसी नुकीली वस्तु से रेखा अक्षर आदि के रूप मेंचिह्नित करना भी है. यूं तो कोई भी बोली या भाषा किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है पर हर लिपि किसीभाषा के लिए ही विकसित होती है. अतः उसके लिए रूढ़ हो जाती है. किसी भी समाज की भाषा उस अंचलकी रीढ़ होती है. भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन ही नहीं होती बल्कि उसमें इतिहास और मानव विकासक्रम के कई रहस्य छिपे होते हैं. बोली के नष्ट होने के साथ ही जनजातीय संस्कृतितकनीक और उसमेंअर्जित बेशकीमती परंपरागत ज्ञान भी तहसनहस हो जाता है. बाज़ाररोजगार और शिक्षा जैसी वजहों सेजनजातीय बोलियों में बाहर के शब्द तो प्रचलित हो रहे हैं लेकिनउनकी अपनी मातृभाषा के स्थानिक शब्दप्रचलन से बाहर हो रहे हैं. दुखद है कि हजारों सालों से बनी एक भाषाएक विरासतउसके शब्दउसकीअभिव्यक्तिखेतीजंगलइलाज और उनसे जुड़ी तकनीकों का समृद्ध ज्ञानउनके मुहावरेलोकगीतलोककथाएं एक झटके में ही खत्म होने लगी हैं.
महात्मा गांधी :-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ‘राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा में नहीं बल्किकिसी अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैंवे आत्महत्या करते हैंइससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता हैबीते 30-40 सालों में एक बड़ी आबादी की मातृभाषा गुम हो चुकी हैइस दौरान देश की 500 भाषा/बोलियोंमें से लगभग 300 पूरी तरह से खत्म हो चुकी हैं और 190 से ज्यादा वेंटिलेटर पर आखिरी सांसें ले रही हैं.’पिछले 50 साल में भारत की क़रीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो गई हैं. माना गया कि 1652 नामों में सेक़रीब 1100 मातृभाषाएं थींक्योंकि कई बार लोग ग़लत सूचनाएं दे देते थे. वडोदरा के भाषा शोध औरप्रकाशन केंद्र के सर्वे के मुताबिक यह बात सामने आई है. जिस देश के राष्ट्रपिता मातृभाषा के हिमायती रहेहैंवहां ऐसी स्थिति बनना किसी हैरत से कम नहींभाषा का इतना बड़ा नुकसान होने के बाद भी कहीं कोईहलचल नहीं हैयह शायद इसलिए कि इनमें से ज्यादातर जनजातियों की मातृभाषाएं थींराजस्थानमध्यप्रदेशछत्तीसगढ़झारखंडबिहारउत्तराखंड और गुजरात जैसे प्रदेश अपनी सांस्कृतिक विविधताऔर लोकसंपदा की समृद्धता के कारण पहचाने जाते रहे हैंइनका अपना भरापूरा लोक संसार रहा हैलेकिन अब यह खत्म होने की कगार पर हैकारण यह कि जिस भाषा में यह लोक संसार रचाबसा हैवहीभाषा/बोली अब खत्म होने जा रही हैउसके साथ ही शायद सब कुछ खत्म हो जाएगा.
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1971 में केवल 108 भाषाओं की सूची ही सामने आईथी क्योंकि सरकारी नीतियों के हिसाब से किसी भाषाको सूची में शामिल करने के लिए उसे बोलने वालों कीतादाद कम से कम 10 हज़ार होनी चाहिएयह भारतसरकार ने कटऑफ़ प्वाइंट स्वीकारा था. इसलिए इसबार भाषाओं के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए हमने1961 की सूची को आधार बनाया. गणेश डेवी केमुताबिक भारत की 250 भाषाएं विलुप्त हो गई हैं जब'पीपुल लिंगुइस्टिक सर्वेकिया गया तब हमें 1100 में सेसिर्फ़ 780 भाषाएं ही देखने को मिलींशायद हमसे 50-60-100 भाषाएं रह गईं हों क्योंकि भारत एक बड़ा देश है और यहां 28 राज्य हैंहमारे पास इतनी ताक़तनहीं थी कि हम पूरे देश को कवर कर सकेंइस काम के लिए बहुत से लोग चाहिए थे. हम यह मान भी लेंकि हमें 850 भाषाएं मिल गईं हैं तब भी 1100 में से 250 भाषाओं के विलुप्त होने का अनुमान है.
2010 में आई यूनेस्को की ‘इंटरेक्टिव एटलस’ की रिपोर्ट बताती है कि अपनी भाषाओं को भूलने में भारतअव्वल नंबर पर हैदूसरे नंबर पर अमेरिका (192 भाषाएंऔर तीसरे नंबर पर इंडोनेशिया (147 भाषाएंहैदुनिया की कुल 6000 भाषाओं में से 2500 पर आज विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है. 199 भाषा याबोलियां ऐसी हैं जिन्हें अब महज 10-10 और 178 को 10 से 50 लोग ही बोलते समझते हैंयानी इनके साथही ये भाषाएं खत्म हो जाएंगी.
यूनेस्को के ‘एटलस आफ  वल्र्ड्स लैंग्वेजेस इन डेंजर’ के मुताबिक अकेले उत्तराखंड में ही गढ़वालीकुमाऊंनी और रोंगपो सहित दस बोलियां खतरे में हैंपिथौरागढ़ की दो बोलियां तोल्चा  रंग्कस तो विलुप्तभी हो चुकी हैंवहीं उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र 12 हजार लोग बोलते हैंपिथौरागढ़ की दारमा और ब्यांसीउत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने केकगार पर हैंदारमा को 1761, ब्यांसी को 1734, जाड को 2000 और जौनसारी को 1,14,733 लोग हीबोलते-समझते हैंएटलस के मुताबिक 20,79,500 लोग गढ़वाली, 20,03,783 लोग कुमाऊंनी और 8000 लोग रोंगपो बोली के क्षेत्र में रहते हैं लेकिनइसका यह मतलब नहीं है कि यहां रहने वाले सभी लोग येबोलियां जानते ही होंराजी बोली पर देश में पहली पीएचडी करने वाले भाषाविद डॉशोभाराम शर्मा बतातेहैं कि यूनेस्को ने पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों में रहने वाले राजी जनजाति की बोली को एटलस में शामिलनहीं किया हैयह भाषा भी विलुप्ति की कगार पर हैअब उत्तराखंड में राजी या वनरावत जनजाति के महज217 लोग ही बचे हैं. 
मध्यप्रदेश में भी करीब दर्जनभर बोलियां विलुप्ति के मुहाने पर पहुंच चुकी हैंप्रदेश की कुल आबादी का35.94 फीसदी अब भी आंचलिक बोलियों पर ही निर्भर है लेकिनइन आदिवासी बोलियों पर बड़ा संकटमंडरा रहा हैभीलीभिलालीबारेलीपटेलियाकोरकूमवासी निहालीबैगानीभटियारीसहरियाकोलिहारीगौंडी और ओझियानी जैसी जनजातीय बोलियां यहां सदियों से बोली जाती रही हैंलेकिन अब येबीते दिनों की कहानी बनने की कगार पर हैंप्रदेश के एक बड़े हिस्सेकरीब 12 जिलों में बोली जाने वालीमालवी भी अब दम तोड़ने लगी हैमध्यप्रदेश के 8.58 फीसदी (51,75,793) लोगों की मातृभाषा मालवी हैउज्जैन में मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बनी सृजन पीठ के निदेशक साहित्यकार जीवनसिंह ठाकुर कहते हैं, ‘मालवी सहित आदिवासियों की कई अन्य बोलियों के उजड़ने की बात किसी बड़े हादसे से कम नहीं हैलेकिन इसे लेकर कहीं कोई पछतावा नजर नहीं आता हैयह हमारी सांस्कृतिक पहचान के खत्म होने कीतरह है.’ मध्यप्रदेश आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान के अनुसंधान अधिकारी एलएन पयोधिबताते हैं, ‘मध्यप्रदेश की 12 आदिवासी बोलियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा हैहम इन बोलियों कोबचाने का लगातार प्रयास कर रहे हैंहमने खत्म होती हुई बोलियों - गौंडीभीली और कोरकूके शब्दकोषऔर व्याकरण बनाई हैअब बैगानीभिलालीबारेली और मवासी पर काम चल रहा हैइनमें ज्यादातरआदिवासी बोलियां हैंचिंता यह भी है कि अब आदिवासियों के बच्चे भी अपनी बोली सीखने से कतराने लगेहैं.’
छत्तीसगढ़ में तो लोगों ने अपनी बोलियों और भाषा को बचाने के लिए आंदोलन भी कियेरायपुर मेंविधानसभा के सामने हाथों में तख्ती लेकर और मुंह पर सफेद पट्टी बांधे लोगों ने जमकर प्रदर्शन कियामांग थी कि यहां सरकारी कामकाज में स्थानीय भाषा छत्तीसगढ़ी का प्रयोग शुरू किया जाए. 28 नवंबर2007 को विधानसभा में इस भाषा को प्रदेश की राजभाषा का दर्जा मिलाप्रस्ताव में साफ़ था कि अब सेविधानसभा में प्रतिनिधि और मंत्री छत्तीसगढ़ी का ही उपयोग करेंगेलेकिन यह प्रस्ताव धरातल पर कभी भीप्रभावी रूप से नहीं उतर पाया. ‘छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना’ के अध्यक्ष अमित बघेल बताते हैं, ‘सरकार यहांके लोगों की आदिम भाषा को अशिक्षितों की भाषा मानती हैअब तक हम लगातार शांतिपूर्ण तरीके सेअपनी बात रखते आए हैंलेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं हो रहा हैयदि ऐसा ही चलता रहा तोहमें उग्र आन्दोलन करना पड़ेगा.’ छत्तीसगढ़ राजभाषा मंच के संयोजक नंदकिशोर शुक्ल बताते हैं, ‘राजभाषा आयोग का गठन तो किया गया था पर अब तक इसके क्रियान्वयन के लिए  तो कोई समितिबनी ही कोई दफ्तर और  कोई राजभाषा अधिकारी नियुक्त हुआराज्य में कोई बैनर तक नहीं लगयागया है.’ वे सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘न्यू टेस्टामेंट और लाइट ऑफ़ भागवत का अनुवाद तो छत्तीसगढ़ी मेंकरवाया जाता हैएमए की पढाई भी छतीसगढ़ी में हो सकती हैलेकिन पहली से पांचवीं तक की बुनियादीपढाईलिखाई को लेकर सरकार गंभीर नहीं है.’
राजस्थान में आधा दर्जन बोलियां यूनेस्को की लुप्तप्राय बोलियों की सूची में शामिल हैंराजस्थान के पश्चिम मेंमारवाड़ी के साथ मेवाड़ीबांगडीढारकीबीकानेरीशेखावटीखेराड़ीमोहवाडी और देवडावाटीउत्तरपूर्व में अहीरवाटी और मेवातीमध्यपूर्व में ढूंढाड़ी और उसकी उप बोलियां - तोरावटीजैपुरीकाटेड़ाराजावाटीअजमेरीकिसनगढ़ीनागर चौल और हाडौतीदक्षिणपूर्व में रांगडी  सौंधवाड़ी (मालवी); औरदक्षिण में निमाड़ी बोली जाती हैघुमंतू जातियों की अपनी बोलियां हैंजैसे गरोडिया लुहारों की बोली-गाडीइनमें ज्यादातर देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती हैंमायण लिपि को मान्यता नहीं मिली हैराजस्थानी कोसंविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए अगस्त 2003 में राजस्थान विधानसभा ने संकल्पपारित किया था.
भाषाओं को सहेजने के प्रयास:- कुछ संस्थान ऐसे भी हैं जो बोली-भाषाओं को सहेजने की दिशा में प्रयासकर रहे हैंबड़ौदा स्थित ‘भाषा संशोधन प्रकाशन केंद्र’ पश्चिम भारत की जनजातीय बोलियों सहेजने कीकोशिश कर रहा हैयह गुजरातमहाराष्ट्रमध्यप्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में रहने वालीआदिवासी जनजातियों की अर्थव्यवस्थाउनके वन-अधिकारविस्थापनपरंपराखेती और सेहत से जुड़ेज्ञान आदि और इनके मौखिक साहित्यगीतकथाएं आदि मुद्दों पर काम कर रहा हैइसके लिए शोध औरप्रकाशन भी किए जा रहे हैंऐसा ही कुछ मैसूर का भारतीय भाषा संस्थान भी कर रहा हैइसके पूर्व उप-निदेशक प्रोजेसी शर्मा बताते हैं, ‘बोलियां लगातार खत्म होने के कगार पर हैंहमें आदिवासियों के बीचकाम करते हुए इन्हें सहेजने की दिशा में काफी काम करने की जरूरत हैअपने स्तर पर हमने कुछ प्रयासशुरू किए हैंइनका अच्छा परिणाम रहा हैहम बोली के साथ ही उसके परंपरागत ज्ञान को भी सहेजने कीकोशिश कर रहे हैं.’ लेकिन ऐसे प्रयास बेहद सीमित ही हैंइसका अंदाजा इस तथ्य से भी लगाया जा सकताहै कि भाषा विज्ञानी ग्रियर्सन के बाद बीते लगभग 100 सालों में कभी बोलियों या भाषाओं का सर्वेक्षण तकनहीं हुआ है.
2011 की जनगणना:- 2011 की जनगणना के अनुसार देश के सवा अरब लोग 1652 मातृभाषाओं में बातकरते हैंइसमें सबसे ज्यादा 42,20,48,642 लोग (41.03 फीसदीहिंदी भाषी हैंराजस्थानी बोलने वाले1,83,55,613 (1.78 फीसदीलोग हैंमध्यप्रदेशराजस्थानगुजरात और महाराष्ट्र के 28,672 वर्ग मील केबड़े क्षेत्र में भील रहते हैं पर भीली बोलने वाले 95,82,957 लोग (0.93 फीसदीऔर संथाली बोलने वाले तोमात्र 64,69,600 (0.63 फीसदीलोग ही हैंदेश में लगभग 550 जनजातियां निवास करती हैं जिनकीअपनी-अपनी बोलियां भी हैंलेकिन इनमें से कई बोलियों को बोलने वालों की तादाद अब घटकर सिर्फहजारों में सिमट चुकी हैजनजातीय बोलियों को लिपिबद्ध किए जाने की अब तक कहीं कोई गंभीर कोशिशनहीं हुई हैइन्होंने अपने वाचिक स्वरूप में ही हजारों सालों का सफ़र तय किया हैजानकारों का मानना हैकि जब तक इन बोलियों या भाषाओं को छात्रों के पाठ्यक्रम से नहीं जोड़ा जातातब तक इन्हें आगे बढ़ानेकी बात बेमानी ही साबित होगीखासतौर पर प्राथमिक शिक्षा में यह बहुत जरुरी हैप्राथमिक शिक्षा सिर्फहिंदी और अंग्रेजी तक ही सिमट गई हैइस कारण बच्चे अपनी स्थानीय बोलियों से लगातार कटते जा रहे हैंऔर अपनी बोलियों को लेकर उनके मन में हीनभावना भी आने लगी हैयदि समय रहते इन बोलियों केसंरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते तो जल्द ही ये पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगीयह सिर्फ एकबोली या भाषा की नहींमानव समाज की कई अमूल्य विरासतों की भी विलुप्ति होगी.
दो तरह की भाषाएं हुई लुप्त:-इसकी दो वजहें हैं और भारत में दो प्रकार की भाषाएं लुप्त हुईं हैं.एक तोतटीय इलाक़ों के लोग 'सी फ़ार्मिंगकी तकनीक में बदलाव होने से शहरों की तरफ़ चले गएउनकीभाषाएं ज़्यादा विलुप्त हुईंदूसरे जो डीनोटिफ़ाइड कैटेगरी हैबंजारा समुदाय के लोगजिन्हें एक समयअपराधी माना जाता थावे अब शहरों में जाकर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहे हैंऐसे 190समुदाय हैंजिनकी भाषाएं बड़े पैमाने पर लुप्त हो गईं हैं. हर भाषा में पर्यावरण से जुड़ा एक ज्ञान जुड़ाहोता हैजब एक भाषा चली जाती है तो उसे बोलने वाले पूरे समूह का ज्ञान लुप्त हो जाता हैजो एक बहुतबड़ा नुकसान है क्योंकि भाषा ही एक माध्यम है जिससे लोग अपनी सामूहिक स्मृति और ज्ञान को जीवितरखते हैं.
भाषा आर्थिक पूंजी भी :-फ़ार्मिंगकी तकनीक में बदलाव आया और तटीय इलाक़ों के लोग शहरों में चलेगए.  इसी के साथ उनकी भाषाओं का पतन हो गया.भाषाओं का इतिहास तो 70 हज़ार साल पुराना हैजबकि भाषाएं लिखने का इतिहास सिर्फ़ चार हज़ार साल पुराना ही हैइसलिए ऐसी भाषाओं के लिए यहसंस्कृति का ह्रास है. ख़ासकर जो भाषाएं लिखी ही नहीं गईं और जब वो नष्ट होती हैंतो यह बहुत बड़ानुकसान होता हैयह सांस्कृतिक नुकसान तो है ही, साथ ही आर्थिक नुकसान भी हैभाषा आर्थिक पूंजीहोती है क्योंकि आज की सभी तकनीक भाषा पर आधारित तकनीक हैं.चाहे पहले की रसायन विज्ञान,भौतिक विज्ञान या इंजीनियरिंग से जुड़ी तकनीक हो या आज के दौर का यूनिवर्सल अनुवादमोबाइलतकनीक सभी भाषा से जुड़ी हैंऐसे में भाषाओं का लुप्त होना एक आर्थिक नुकसान है.
शहर में हो भाषाओं के लिए जगह:-भाषा बचाने का मतलब है कि भाषा बोलने वाले समुदाय को बचाना.ऐसे समुदायों के लिए जो नए विकास के विचार से पीड़ित हैंउनके लिए एक माइक्रोप्लानिंग की ज़रूरतहै. हर समुदाय चाहे वह सागर तटीय होघुमंतू समुदाय होपहाड़ी इलाक़ोंमैदानी और शहरी सभीसमुदायों के लोगों के लिए अलग योजना की ज़रूरत है. बहुत से लोग शहरीकरण को भाषाओं के लुप्तहोने का कारण मानते हैंलेकिन मेरे हिसाब से शहरीकरण भाषाओं के लिए खराब नहीं हैशहरों में इनभाषाओं की अपनी एक जगह होनी चाहिएबड़े शहरों का भी बहुभाषी होकर उभरना ज़रूरी है.
सभी भाषाओं को मिले सुरक्षा:-हिंदी को डरने की ज़रूरत नहीं क्योंकि हिंदी दुनिया की भाषाओं के मामलेमें चीनी और अंग्रेज़ी के बाद सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा हैवह स्पेनिश से आगे निकल गई है.मगर छोटी भाषाओं का बहुत ख़तरा है. जिसकी लिपि नहीं हैं उसे बोली कहने का रिवाज़ हैऐसे में अगरदेखें तो अंग्रेज़ी की भी लिपि नहीं है वह रोमन इस्तेमाल करती हैकिसी भी लिपि का इस्तेमाल दुनिया कीकिसी भी भाषा के लिए हो सकता हैजो भाषा प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में नहीं आईवह तो तकनीकी इतिहासका हिस्सा है  कि भाषा का अंगभूत अंगइसलिए मैं इन्हें भाषा ही कहूंगा. सरकारें  तो भाषा को जन्म देसकती हैं और  ही भाषा का पालन करा सकती हैंमगर सरकार की नीतियों से कभी-कभी भाषाएं समयसे पहले ही मर सकती हैंइसलिए सरकार के लिए ज़रूरी है कि वह भाषा को ध्यान में रखकर विकास कीमाइक्रो प्लानिंग करे. हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर की योजनाएं बनती हैं और राज्यों में इसकी ही छवि देखीजाती हैइसी तरह पूरे देश में भाषा के लिए योजना बनाना ज़रूरी हैमैं यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि1952 के बाद देश में भाषावार प्रांत बने. इसीलिए हम मानते हैं कि हर राज्य उस भाषा का राज्य हैचाहेवह तमिलनाडु होकर्नाटक हो या कोई औरहमने केवल शेड्यूल में 22 भाषाएं रखी हैंकेवल उन्हें हीसुरक्षा देने के बजाय सभी भाषाओं को बगैर भेदभाव के सुरक्षा देना ज़रूरी हैअगर सरकार ऐसा नहींकरेगी तो बाकी सभी भाषाएं मृत्यु के रास्ते पर चली जाएंगीं.
                                        Image result for भारत की विलुप्त होती बोलियां और भाषाएं
हिंदी को डरने की ज़रूरत नहीं:-बंजारे समुदायों ने अपनी छवि के चलते बड़े शहरों में पलायन किया औरपहचान छिपाकर रखीइस वजह से कई भाषाएं विलुप्त हो गईं.दस हज़ार साल पहले लोग खेती की तरफ़मुड़े उस वक़्त बहुत सी भाषाएं विलुप्त हो गईंहमारे समय में भी बहुत बड़ा आर्थिक बदलाव देखने में रहा हैऐसे में भाषाओं की दुर्दशा होना स्वाभाविक हैमगर अंग्रेज़ी से हिंदी को डर या हिंदी से अन्यभाषाओं को डर ठीक नहीं है. पिछले 50 साल में हिंदीभाषी 26 करोड़ से बढ़कर 42 करोड़ हो गए जबकिअंग्रेज़ी बोलने वालों की संख्या 33 करोड़ से बढ़कर 49 करोड़ हो गईइस तरह हिंदी की वृद्धि दर अंग्रेज़ीसे ज़्यादा है. मेरे हिसाब से हिंदी को डरने की ज़रूरत नही क्योंकि हिंदी दुनिया की भाषाओं के मामले मेंचीनी और अंग्रेज़ी के बाद सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा हैवह स्पेनिश से आगे निकल गई हैमगरछोटी भाषाओं को बहुत ख़तरा है

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