जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने की नौकर की सेवा
ईश्वरचंद्र विद्यासागर दया और उदारता की प्रतिमूर्ति थे। समाज की दृष्टि में छोटे कहे व समझे जाने वाले व्यक्तियों के प्रति भी उनका व्यवहार अत्यंत मधुर रहता था। उनके घर में एक नौकर था, जो घरेलू कामकाज करता था। विद्यासागर उसके प्रति काफी स्नेह रखते थे और उसके साथ बिल्कुल अपने परिवार के सदस्य की भांति व्यवहार करते थे। एक दिन वे अपने मकान की सीढ़ियों से उतर रहे थे कि उन्होंने देखा उनका नौकर सीढ़ियों में ही सो रहा है और उसके साथ में एक पत्र है। विद्यासागर ने धीरे से उसके हाथ से पत्र निकालकर पढ़ा तो उन्हें पता चला कि उसके घर से कोई दुखद समाचार था। विद्यासागर ने देखा कि नौकर के चेहरे पर अश्रुओं की लकीर थी, शायद वह रोते-रोते सो गया था। उन्हें उसके प्रति संवेदना जागृत हुई और वे कमरे से पंखा लाकर नौकर पर हवा करने लगे ताकि वह आराम से सो सके। उसी समय उनका एक मित्र वहां आया। वहां का दृश्य देखकर वह चकित होकर बोला – आप तो हद कर रहे हैं। सात-आठ रुपये की पगार वाले नौकर की सेवा में लगे हैं। तब विद्यासागर ने कहा मेरे पिता जी भी सात-आठ रुपये मासिक पाते थे। मुझे स्मरण है कि एक दिन वे चलते-चलते सड़क पर अचेत हो गए थे और एक राहगीर ने पानी पिलाकर उनकी सेवा की थी। अपने इस नौकर में मैं अपने स्वर्गीय पिता की छवि देख रहा हूं।सार यह है कि हृदय की पवित्रता का पता मधुर शब्दों से नहीं, आचरण से चलता है। समान रूप से सभी के लिए स्नेहमय व्यवहार ही व्यक्ति की उदारता और बड़प्पन को रेखांकित करता है।
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