Sunday, 25 June 2017

विलुप्त होती जा रही नैतिकता और मानवता

विलुप्त होती जा रही नैतिकता और मानवता


आज का मानव कहने को और भौतिक रुप में दिखने को बहुत ही आधुनिक तथा सम्पन्न हो गया है, परन्तु आन्तरिक रुप में वह बहुत ही खोखला और टूट सा गया है। उसमें सहनशीलता खत्म सी हो गयी है. दूसरों के अन्धानुकरण ने विश्व को बरबादी के कागार पर लाकर खड़ा कर दिया है. असंतोषअलगावउपद्रवआंदोलनअसमानताअसामंजस्यअराजकताआदर्श विहीनताअन्यायअत्याचारअपमानअसफलताअवसादअस्थिरताअनिश्चिततासंघर्षहिंसा ने ही अपनी जगह मजबूत बना ली है. आज हमारे जीवन को यही सब घेरे हुए है. व्यक्ति एवं समाज में साम्प्रदायिकताजातीयताभाषावादक्षेत्रीयतावादहिंसा कीसंकीर्ण कुत्सित भावनाओं  समस्याओं के मूल में उत्तरदायी कारण है. मनुष्य का नैतिक और चारित्रिकपतन अर्थात नैतिक मूल्यों का क्षय एवं अवमूल्यन बड़ते जा रहे हैं . नैतिकता का सम्बंध मानवीय अभिवृत्तिसे हैइसलिए शिक्षा से इसका महत्त्वपूर्ण अभिन्न  अटूट सम्बंध हैकौशलों  दक्षताओं की अपेक्षाअभिवृत्ति-मूलक प्रवृत्तियों के विकास में पर्यावरणीय घटकों का विशेष योगदान होता हैयदि बच्चों केपरिवेश में नैतिकता के तत्त्व पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं तो परिवेश में जिन तत्त्वों की प्रधानता होगी वेजीवन का अंश बन जायेंगेइसीलिए कहा जाता है कि मूल्य पढ़ाये नहीं जातेअधिग्रहीत किये जाते हैं. इननौतिक मूल्यों पर बहुत ही ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है. इसके अभाव में हम आदिम युग में जंगल न्यायकी तरफ बड़ते जा रहे हैं .
हम उन गुणों को नैतिक कह सकते हैं जो व्यक्ति के स्वयं केसर्वांगीण विकास और कल्याण में योगदानदेने के साथ-साथ किसी अन्य के विकास और कल्याण में किसी प्रकार की बाधा  पहुंचाएविशेष ध्यान देनेयोग्य बात यह है कि नैतिक मूल्यों की जननी नैतिकता सद्गुणों का समन्वय मात्र नहीं हैअपितु यह एकव्यापक गुण है जिसका प्रभाव मनुष्य के समस्त क्रियाकलापों पर होता है और सम्पूर्ण व्यक्तित्व इससेप्रभावित होता हैवास्तव में नैतिक मूल्य, नैतिकता आचरण की संहिता हैहमें इस बात को भली भांतिसमझना होगा कि नैतिक मूल्य नितांत वैयक्तिक होते हैंअपने प्रस्फुटन उन्नयन  क्रियान्वय से यह क्रमशःसामाजिक  सार्वभौमिक होते जाते हैं.
एक ही समाज में विभिन्न कालों में नैतिक संहिता भी बदल जाती हैनैतिकता-नैतिक मूल्य वास्तव में ऐसीसामाजिक अवधारणा है जिसका मूल्यांकन किया जा सकता हैयह कर्तव्य की आंतरिक भावना है और उनआचरण के प्रतिमानों का समन्वित रूप है जिसके आधार पर सत्य असत्यअच्छा-बुराउचित-अनुचित कानिर्णय किया जा सकता है और यह विवेक के बल से संचालित होती है. आधुनिक जीवन में नैतिक मूल्यों कीआवश्यकतामहत्त्व अनिवार्यता  अपरिहार्यता को इस बात से सरलता  संक्षिप्ता में समझा जा सकता हैकि संसार के दार्शनिकोंसमाजशात्रियोंमनोवैज्ञानिकों शिक्षा शात्रियोंनीति शात्रियों ने नैतिकता को मानवके लिए एक आवश्यक गुण माना है.
हमारी शिक्षा केवल बौद्धिक विकास पर ध्यान देती हैवह शिक्षार्थी में बोध जाग्रत नहीं करती, वह जिज्ञासानहीं जगाती जो स्वयं सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करे और आत्मज्ञान की ओर ले जायेसही शिक्षा वही होसकती है जो शिक्षार्थी में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित कर सके. नैतिकता मनुष्य के सम्यकजीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैइसके अभाव में मानव का सामूहिक जीवन कठिन हो जाता हैनैतिकतासे उत्पन्न नैतिक मूल्य मानव की ही विशेषता हैनैतिक मूल्य ही व्यक्ति को मानव होने की श्रेणी प्रदान करतेहैंइनके आधार पर ही मनुष्य सामाजिक जानवर से ऊपर उठ कर नैतिक अथवा मानवीय प्राणी कहलाताहैअच्छा-बुरासही गलत के मापदण्ड पर ही व्यक्तिवस्तुव्यवहार  घटना की परख की जाती हैयेमानदंड ही मूल्य कहलाते हैंऔर भारतीय परम्परा में ये मूल्य ही धर्म कहलाता है अर्थात ‘धर्म’ उन शाश्वतमूल्यों का नाम है जिनकी मनवचनकर्म की सत्य अभिव्यक्ति से ही मनुष्य मनुष्य कहलाता है अन्यथाउसमें और पशु में भला क्या अंतरधर्म का अभिप्राय है मानवोचित आचरण संहितायह आचरण संहिताही नैतिकता है और इस नैतिकता के मापदंड ही नैतिक मूल्य हैंनैतिक मूल्यों के अभाव में कोई भी व्यक्तिसमाज या देश निश्चित रूप से पतनोन्मुख हो जायेगानैतिक मूल्य मनुष्य के विवेक में स्थितआंतरिक अंतः र्स्फूत तत्त्व हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में आधार का कार्य करते हैं.
नैतिक मूल्यों का विस्तार व्यक्ति से विश्व तकजीवन के सभी क्षेत्रों में होता हैव्यक्ति-परिवारसमुदायसमाजराष्ट्र से मानवता तक नैतिक मूल्यों की यात्रा होती हैनैतिक मूल्यों के महत्त्व को व्यक्ति समाज राष्ट्र विश्व की दृष्टियों से देखा समझा जा सकता हैसमाजिक जीवन में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन के कारणउत्पन्न समस्याओं की चुनौतियों से निपटने के लिए और नवीन  प्राचीन के मध्य स्वस्थ अंतः क्रिया कोसम्भव बनाने में नैतिक मूल्य सेतु-हेतु का कार्य करते हैंनैतिक मूल्यों के कारण ही समाज में संगठनकारीशक्तियां  प्रक्रिया गति पाती हैं और विघटनकारी शक्तियों का क्षय होता है. नैतिकता समाज सामाजिकजीवन के सुगम बनाती है और समाज में अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखती हैसमाज राष्ट्र में एकीकरण औरअस्मिता की रक्षा नैतिकता के अभाव में नहीं हो सकती हैविश्व बंधुत्व की भावनामानवतावादसमताभावप्रेम और त्याग जैसे नैतिक गुणों के अभाव में विश्व शांतिअंतर्राष्ट्रीय सहयोगमैत्री आदि की कल्पनाभी नहीं की जा सकतीविश्व  के अनेक भागों में रोज के रोज लड़ाइयां हो रही हैं. लोग मरते-कटते जा रहेहैं. एक दे दूसरे का अतित्व मिटाने पर अमादा है. गुटबाजी हो रही है. अपने अपने हित को बढ़ावा दियाजा रहा है.

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