Friday, 2 December 2016

तुम भूल जाओगी मुझे

"देखता रहा अगर इस दिन को इसी तरह
तो यह ढल जायेगा
पुकार लूं तुम्हारा नाम अगर प्रिय
तो तुम भूल जाओगी मुझे!

जिस पत्ती को छूता हूँ
वह झर जाती है
जिस हवा को सांसों में भरता हूँ
उसमें समा जाता है कार्बन!

रोज ढहता जाता है
संवारने की जतन में यह जीवन
रोज देखता हूँ उम्मीद के आकाश में
बढता जाता अंधेरा!

एक दिन समेट कर इस मिट्टी के तन को
बारिश में खड़ा होता हूँ
एक दिन पिघल जाती है तेज धूप में
मोम की तरह सब इच्छाएं!

रोज मुट्ठी से रेत की तरह
फिसलता जाता है जीवन
रोज अंधेरे में निसृत होती है
निराकार यह देह!

किसी ने सुनाई थी
शब्दों में पारस छुपे होने की कहानी
रोज तलाशता रहता हूँ कविता में
जिंदगी का गुम होता जाता सोना
चकमक पत्थर की रोशनी में चमकते तुम्हारे चेहरे की स्मृति
कहीं मेरे मन में है
रोज अपनी आत्मा को घिसता रहता हूँ
पवित्र अग्नि की तलाश में!"

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