Saturday, 26 November 2016

त्याग का सुख

                                         त्याग का सुख)


एक राजा था, वह बहुत ही दानी प्रवृत्ति का था। यदि उसके सामने कोई भी भूखा आ जाता। वह तुरन्त अपना भोजन भूखों को दे देता था। अपने सारे स्वार्थ भूल कर वह निस्वार्थ भाव से लोगों की सहायता करता रहता था।
एक दिन की बात थी। वह शाम को भोजन करने के लिए बैठा। वह यह जान कर बहुत ही खुश हुआ की आज उसके राज्य में कोई भी भूखा नही है। आज वह कई दिनो बाद पेट की क्षुधा मिटायेगा। वह दिन प्रतिदिन अपना भोजन, भूखों को दान कर दिया करता था और बिना खाये दूसरों की सेवा में लगा रहता था। परन्तु आज कोई भी नही आया, जिसकी सेवा की जा सकती थी। जब वह खाने बैठा तो एक ब्राह्मण आया। राजा ने तुरन्त उन्हें भोजन दिया। अब जैसे ही वह पुनः भोजन के लिए बैठा, फिर से फकीर आ गया, राजा ने अपना बचा भोजन फ़कीर को दे दिया। उसके बाद उनके पास भूखा जमादार आया, राजा ने उसे भी भोजन खिलाया। अब उसके पास केवल पानी बचा। उसने सोचा चलो कोई बात नहीं आज जल पीकर ही पेट भर लूँगा। अब वह जैसे ही जल पीने के लिए हाथ बढ़ाया, उसके महल के पास एक प्यासा कुत्ता आ गया। उसने वह पानी भी कुत्ते को दे दिया। अब वह राजा रोज़ की तरह भूखा ही रह गया। जैसे ही वह सोने के लिए गया, निद्रा आने से पहले उसे अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई, उसके दिल को सुकून मिला। उसकी वह अनुभूति शाश्वत अनुभूति थी, जिसे हम शब्दों में वर्णित नही कर सकते।

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