Saturday, 26 November 2016

शिव महिमा


                                                                           शिव महिमा

महासमर में गाण्डीवधारी अर्जुन कौरवों का संहार कर रहे थे। जिधर श्रीकृष्ण रथ को घुमाते थे, उधर अर्जुन के बाणों से बड़े- बड़े महारथी तथा विशाल सेना मारी जाती थी। द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात् कौरव सेना भाग खड़ी हुई। इसी बीच अचानक महर्षि वेदव्यास जी घूमते हुए अर्जुन के पास आ गये। उन्हें देख कर जिज्ञासावश अर्जुन ने उनसे पुछा- महर्षि! शत्रुसेना का संहार जब मैं अपने बाणों से कर रहा था, उस समय मैंने देखा कि एक तेजवस्वी महापुरुष हाथ में त्रिशूल लिये हमारे रथ के आगे-आगे चल रहे थे। सूर्य के समान तेजस्वी महापुरुष का पैर जमीम पर नहीं पड़ता था। त्रिशुल का प्रहार करते हुए भी वे उसे हाथ से कभी नहीं छोड़ते थे। उन्होंने ही समस्त शत्र्ओं को मार भगाया है। किंतु लोग समझते हैं कि मैंने ही उन्हें मारा और भगाया है। भगवान्! मुझे बताइये, वे महापुरुष कौन थे?
कमण्डलु और माला धारण किये हुए महर्षि वेदव्यास ने शान्तभाव से उत्तर दिया- वीरवर! प्रजापतियों में प्रथम, तेज:स्वरुप, अन्तर्यामी तथा सर्वसमर्थ भगवान् शक्ङर के अतिरित्त उस रोमान्चकारी घोर संग्राम में अश्मत्थामा, कर्ण और कृपाचार आदि के रहते हुए कौरव सेना का विनाश दूसरा कौन कर सकता था। तुमने उन्हीं भुनेश्वर का दरेशन किया है। उनके मस्तक पर जटाजूट तथा शरीर पर वल्कल वस्त्र शोभा देता। भगवान् भय भयानक होकर भी चन्द्रमा को मुकुट रुप से धारण करते हैं। साक्षात् भगवान् शक्ङर ही वे तेजस्वी महापुरुष हंथ जो कृपा करके तुम्हारे आगे- आगे चला करते हैं। जिनके हाथों में त्रिशूल, ढाल, तलवार और पिनाक आदि शस्त्र शोभा पाते हैं, उन शरणागतवत्सल भगवान् शिवकी आराधना करनी चाहिये।
एक बार ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके तीन असुर- तारकाक्ष, कमलाक्ष और विघुन्माली आकाश में विमान के रुप में नगर बसाकर रहने लगे। घमण्ड में फूलकर ये भयंकर दैत्य तीनों लोकों को कष्ट पहुँचाने लगे। देवराज इन्द्रादि उनका नाश करने में सफत न हो पाये। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान् शक्ङर ने उन तोनों पुरों को भस्म कर दिया। वीरवर अर्जुन! उनका भोलापर सुनो- जिस समय दैत्यों के नगरों को महादेव जी भस्म कर रहे थे, उस समय पार्वती जी भी कौतूहलवश देखने के लिये वहाँ आयीं। उनकी गोद में एक बालक था। वे देवताओं से पूछने लगीं- पहचानो , ये कौन हैं? इस प्रश्न से इन्द्र के हृदय में असूया की आग जल उठी और उन्होंने जैसे ही उस वालकपर बज्र का प्रहार करना प्रहार करना चाहा, तत्क्षण उस बालक ने हँसकर उन्हें स्तम्भित कर दिया। उनकी वज्रसहित उठी हुई बांह ज्यों- की-त्यों रह गयी। अब क्या था, बांह उसी तरह ऊपर उठाये हुए इन्द्र दौड़ने लगे। अमारवती- विहार करने वाले इन्द्र अब तो महान कष्ट से पीड़ित होकर ब्रह्मा जी शरण में गये। ब्रह्मा जा को दया आ गयी। वे इन्द्र को लेकर शंकर जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी शंकर जी को प्रणाम करके बोले – भगवान आप ही विश्व को सहारा तथा सवको शरण देने वाले हैं। भूत और भविष्य के स्वामी जगदीश्वर! ये इन्द्र आपके क्रोध से पीड़ित हैं, इनपर कृपा कीजिये।
सर्वात्मा महेश्वर प्रसन्न हो गये। देवताओं पर कृपा करने के लिये वे हंस पड़े। सबने जान कि पार्वती जी की गोद में चराचर जगत के स्वामी भगवान शंकर जी ही थे। वे सभी मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं, इसलिये उन्हें शिव कहते हैं। वेद, पुराण तथा अध्यात्म शास्त्रों में जो परम रहस्य है, वह भगवान महेश्वर ही हैं।

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