Saturday, 26 November 2016

ललकार सहन नहीं

                                                        ललकार सहन नहीं

निष्कण्टक राज्य पाने की लालसा से दुर्योधन कौरव- सेना को संगठित और उतसाहित आये दिन नये सेना पति बनाकर करता था, लेकिन सेनापति मद्रराज शल्यकी मृत्यु और पाण्डवों की मार पड़ने से दुर्योधन की सेना भयभीत होकर चारों ओर भागने लगी। घोड़ों पर चढ़कर भागे और कुछ लोग हाथियों पर। बहुत रथ में बैठकरम नौ दो ग्यारह हो गये। बेचारे पैदल योद्धा भय के मारे बड़े जोर से भाग रहे थे।
उन सब को हिम्मत खोकर भागते देख विजयाभिलाषी पाण्डवों और पांचालों ने दूर तक उनका पीछा किया। इसी बीच दुर्योधन इक्कीस हजार सैनिकों के साथ अपना रथ लेकर उनके बीच आ गया। फिर तो हर्ष में भरे हुए उन योद्धाओं और पाण्वों में घमासान युद्ध होने लगा। दण्डधारी यमराज की भांति भीम सेना ने अकेले ही अपनी गदासे इक्कीस हजार योद्धाओं को मार गिराया। लेकिन समस्त पाण्डव एक साथ होकर भी दुर्योधन को परास्त नहीं कर सके। मौका पाकर दुर्योधन ने अपनी भागती सेना को वापस बुला लिया। फिर क्या था? चारों तरफ बाणों की वर्षा होने लगी। यह एक ऐसा युद्ध हुआ जिसमें कौरवों की पूरी-की-पूरी ग्यारह अक्षौहिणी सेना मारी गयी। लड़ने वाले हजारों राजाओं में केवल एक दुर्योधन ही बचा। अब उसके पास न सेना थी, न सवारी। उधर पाण्डवों के पास दो हजार रथी, सात सौ हाथीसवार, पांच हजार घुड़सवार और दस हजार पैदल सेना थी। ग्यारह अक्षौहिणी सेना का मालिक दुर्योधन अपना कोई सहायक न देखकर अपनी गदा लेकर पूर्व दिशा की ओर स्थित सरोवर में जा छिपा।
धर्मात्मा युधिष्ठर अपने भाइयों के साथ दुर्योधन का वध करने के लिये उसका पता लगाने लगे।गुप्तचर छोड़े गये, पर उसका कहीं कोई पता न चला। संयोगवश कुछ व्याधों ने कृपाचार्य, अश्वत्थामा तथा कृतवर्माद्वारा दुर्योधन से की जा रही वार्त्ता को सुनकर धन के लोभ से पाण्डवों को दुर्योंधन का पता बता दिया। युधिष्ठिर अपने भाइयों तथा सेनासहित उस सरोवर के पास आ पहुंचे जहां दुर्योधन छिपा था। कृपाचार्य आदि पाण्डवों को देखते ही दुर्योधन की आज्ञा लेकर चले गये।
सरोवर पर पहुंच कर युधिष्ठिर ने हंसते-हंसते पानी में छिपे हुए दुर्योधन से कहा- ‘सुयोधन’! यह कैसा अनुष्ठान कर रहे हो? समस्त क्षत्रियों तथा अपने कुल का संहार कराकर अब अपनी जान बचाने के लिये सरोवर में जा घुसे हो? दुर्योधन ने पानी में से ही जवाब दिया- मैंने प्राणों के भय से नहीं, बल्कि थक जाने के कारण ऐसा किया है। अब मुझे राज्य की इच्छा नही है। मेरा अपना कहाजाने वाला जब कोई जीवित न रहा तो मैं स्वयं भी जीवित नहीं रहना चाहता। युदिष्ठिर ने दुर्योधन को डाँटकर कहां कि जल से बाहर निकलो, मैं तो तुम्हें युद्ध में जीतकर ही राज्य का उपभोग करुगा। युधिष्ठिर की फटकार तथा कड़वी बातें सुनकर दुर्योधन बोला- मैं तुम्हारे साथ युद्ध कैसे कर सकता हूं, तुम अपने हितैसी, सेना तथा वाहन आदि के साथ हो और मैं अकेला। यदि तुम बारी- बारी से एक-एक वीर को लड़ाओ तो मैं अकेला आऊं? युधिष्ठिर ने उसे आश्वासन देकर कहा- दुर्योधन! उठो तो सही। आओ, मेरे साथ ही गदायुद्ध करो।
युदिष्ठिर के इस कथन को दुर्योधन सहन न कर सका। वह कंधे पर लोहे का गदा रखकर बंधे हुए जल को चीरता हुआ। बाहर निकलने लगा। उस समय वह दण्डधारी यमराज के समान लग रहा था। उसे पानी से बाहर निकलने लगा। उस समय वह दण्धारी यमराज के समान लग रहा था। उसे पानी से बाहर निकालते देख पाण्डव तथा पान्चाल बहुत प्रसन्न हुए और ताली पीटने लगे।

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