द्वारिका धाम
द्वारिका धाम को चारों धामों में प्रमुख धाम के रूप में जाना जाता है। द्वापर युग में यह भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी थी। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ, लालन पालन गोकुल और उनकी कर्मस्थली द्वारिकापुरी ही थी। यहीं से पांडवों की सहायता कर भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध का संचालन किया था। विश्वकर्मा द्वारा द्वारिकापुरी का निर्माण कराया गया था।
द्वारिका के चारों ओर बहुत लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। कई द्वारों की नगरी होने के कारण इसका नाम द्वारिका पड़ा। यह दीवार आज भी समुद्र तल में है। भारत के प्राचीनतम नगरों में से द्वारिका एक है। द्वारिका को सभी तीर्थों में उत्तम माना जाता है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु यहां आकर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करता है उसे मुक्ति प्राप्त होती है। द्वारिका का पूर्व में नाम कुशवती था, जो उजाड़ हो चुकी थी। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी स्थान पर नए नगर का निर्माण कराया।
कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने समुद्र तट पर द्वारिका नगरी का निर्माण कराया और यहां नए राज्य की स्थापना की। द्वारिका नगरी सोने की थी। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के परलोकगमन के पश्चात द्वारिकापुरी समुद्र में समाहित हो गई। सिर्फ द्वारिकाधीश का मुख्य मंदिर ही यहां शेष रह गया। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वर्गारोहण के समय अपने परिजनों और भक्तों से द्वारिका छोड़ने और इसके डूब जाने की बात कही थी। आज तक यह नगरी समुद्र में डूबी हुई है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए भगवान श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया था। इसी श्राप के प्रभाव से द्वारिका नगरी डूबी।
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