खुद को चोटिल कर संत नामदेव ने दिया संदेश
महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव के बचपन की एक घटना है। एक दिन नामदेव जंगल से घर आए तो उनकी धोती पर खून लगा था। जब उनकी मां की निगाह खून पर गई तो वे घबरा गई। तत्काल दौड़कर नामदेव के पास जाकर उन्होने पूछा अरे नामू, तेरी धोती में कितना खून लगा है। क्या हुआ तेरे साथ? कहीं गिर पड़ा था क्या? नामदेव ने उत्तर दिया नहीं मां, गिरा तो नहीं था। मैंने कुल्हाड़ी से स्वयं ही अपना पैर छीलकर देखा था। मां ने धोती उठाकर देखा कि पैर में एक जगह की चमड़ी छिली हुई है। इतना होने पर भी नामदेव ऐसे चल रहे थे मानो उन्हे कुछ हुआ ही न हो। नामदेव की मां ने यह देखकर पूछा –नामू, तू बड़ा मूर्ख है। कोई अपने पैर पर भला कुल्हाड़ी चलाता है? पैर टूट जाए,लंगड़ा हो जाए,घाव पक या सड़ जाए तो पैर कटवाने की नौबत आ जाए। नामदेव बोले- तब पेड़ को भी कुल्हाड़ी से चोट लगती होगी। उस दिन तेरे कहने से मैं पलाश के पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाकर उसकी छाल उतार लाया था मेरे मन में आया कि अपने पैर की छाल भी उतारकर देखूं, मुझे जैसे लगेगी, वैसी ही पेड़ को भी लगती होगी। वह बोली-नामू, तू महान साधु बनेगा। पेड़ों में भी मनुष्य के जैसा ही जीवन है। अपने चोट लगने पर जैसा कष्ट होता है,वैसा ही उनको भी होता है। अब ऐसा गलत काम कभी तुझसे नहीं कराऊंगी।
यहां नामदेव ने प्रकृति रक्षा का महान संदेश दिया है, जो आज के युग की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रकृति प्रदत्त हवा, पानी व अन्न पर ही मानव जीवन का अस्त्तिव टिका है। अत: तेजी से कटते जा रहे जंगलों को बचाइए।
यहां नामदेव ने प्रकृति रक्षा का महान संदेश दिया है, जो आज के युग की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रकृति प्रदत्त हवा, पानी व अन्न पर ही मानव जीवन का अस्त्तिव टिका है। अत: तेजी से कटते जा रहे जंगलों को बचाइए।
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