Saturday, 26 November 2016

दान का अर्थ है सम विभाजन

                                    दान का अर्थ है सम विभाजन🙏


एक व्यक्ति बहुत धनवान था। लेकिन जितना पैसा उसके पास था, उतना धैर्य नहीं था। किसी को एक पैसा देता तो सभी से कहता फिरता। हर जगह हर व्यक्ति से वह अपनी दानशीलता और संपन्नता का गुणगान करता। एक दिन उसे पता चला कि शहर में एक बड़े महात्मा आए हैं। उसने सोचा कि उनसे मिलकर उन्हें कुछ भेंट करना चाहिए। वह उनके पास जा पहुंचा। अभिवादन के बाद महात्मा ने उससे आने का प्रयोजन पूछा तो पहले तो उसने अपनी दानशीलता की प्रशंसा की।
अपनी प्रशंसा के लंबे आख्यान के बाद उस आदमी ने एक थैली निकालकर महात्मा के सामने रखी और बोला-'मैंने सोचा कि आपको पैसे की तंगी रहती होगी, इसलिए यह लेता आया। ये पूरी एक हजार मुहरें हैं।' ऐसा कहते हुए उसकी आंखों में अभिमान भी उभर आया। महात्मा ने थैली को एक ओर सरकाते हुए कहा-'मुझे तुम्हारे पैसे की नहीं, तुम्हारी जरूरत है।' यह सुनकर धनवान मर्माहत हो गया। आखिर महात्मा की हिम्मत कैसे हुई जो उसकी दी हुई भेंट उन्होंने ठुकरा दी। आज तक यह साहस किसी ने नहीं किया। उसका अभिमान और बढ़ गया।
महात्मा उसकी यह अवस्था देखकर बोले-'क्यों, तुम्हें बुरा लगा न!' धनिक ने कहा-'बुरा लगने की तो बात ही है, इतनी बड़ी रकम को आपने ऐसे ठोकर मार दी जैसे यह मिट्टी हो।' यह सुनकर महात्मा ने जवाब दिया-'सेठ याद रखो, जिस दान के साथ दाता अपने को नहीं देता, वह दान मिट्टी के बराबर होता है। दान का अर्थ है सम विभाजन। दूसरे का हिस्सा तुमने ले लिया है। उसे लौटाते हो तो इसमें अभिमान का अवसर कहां रहता है? यह तो चोरी का प्रायश्चित है।' यह सुनकर धनिक का गर्व चूर-चूर हो गया। उसी दिन से उसकी सोच की दिशा ही बदल गई।

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