Saturday, 26 November 2016

प्रेम महत्त्वपूर्ण है।

                                                                    प्रेम महत्त्वपूर्ण है।

एक बार ईसा मसीह किसी गांव में पहुंचे। वहां किसी दुराचारी व्यक्ति ने मंडली सहित उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया। ईसा मसीह ने प्रेमपूर्वक उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। गांव के सारे लोग दुराचारी व्यक्ति से घृणा करते थे और उससे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे। सब लोग आश्चर्यचकित थे कि ईसा ने उस व्यक्ति के घर भोजन करना आखिर स्वीकार कर कैसे लिया। एक बूढ़े व्यक्ति ने तो गांव वालों को सलाह दे डाली कि सब ईसा के पास चलें और उनसे अपने मन की बात साफ-साफ कह दें।
बको उस बुजुर्ग की सलाह पसंद आई और वे एक साथ ईसा मसीह से मिलने चल दिए। गांव वालों का दल जब उनके पास पहुंचा तो, वे भोजन के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे। बुजुर्ग की बात उन्होंने ध्यान से सुनी और फिर मुस्कराकर पूछा-'बाबा, आप मुझे एक बात बताएं। चिकित्सक स्वस्थ मनुष्य के घर पर जाता है या किसी रोगी के। मैं भी चिकित्सक बनकर एक रोगी के घर जा रहा हूं। उसे घृणा का विष नहीं, प्रेम की अचूक औषधि चाहिए।
बुरे व्यक्ति को अच्छा बनाना है तो उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। उसके संपर्क में आओ, तभी वह आपका सम्मान करेगा। उसके अंदर जो दुर्गुण मौजूद हैं, उनसे हमें अवश्य बचना चाहिए, किंतु उससे घृणा करके उसका हृदय कभी नहीं बदला जा सकता। हमें पापी से नहीं पाप से घृणा करनी चाहिए। उसे पाप से मुक्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। संसार में कोई भी व्यक्ति निर्विकार नहीं है। एक दूसरे पर दोषारोपण करने से जीवन, समाज और संसार की गति अवरुद्ध हो जाएगी। इसलिए तिरस्कृत व बहिष्कृत करने की बजाय किसी को अपनत्व से समझाना व सुधारना ही ठीक है।' यह सुनते ही गांव वाले उन्हें नमन कर सिर झुकाए चुपचाप वापस चले गए।

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