अनुभव, किताबों से ज्यादा महत्तवपूर्ण
एक नाविक था, जो नौका चलाकर अपनी गुजर-बसर करता था। उसकी नौका काफी अच्छी थी, नौके में बना हर कमरा साफ-सुथरा, खुला और सभी सुविधाओं से लैस था। यही कारण था कि उसकी नौका की बड़ी चर्चा थी। एक बार एक विद्वान पंडित उसकी नौका लेकर सफर के लिए चल पड़े। कई दिनों तक अभ्यास करते हुए थक गए थे। इसलिये आराम से प्रकृति की सुंदरता देखने का, सागर किनारों पर भटकने का सपना लेकर वे सफर के लिए निकले थे। नाविक अनपढ़ था, किंतु अपने काम में बड़ा माहिर था। बडे से बडे संकट से कैसे पार उतारा जाए, इसका काफी अनुभव उसके पास था। रोज शाम वह पंडितजी के पास जाता, बड़े अपनेपन से उनकी पूछताछ करता, कई विषयों का ज्ञान उनसे प्राप्त करता और खुशी खुशी अपने काम पर लौट जाता। एक दिन शाम को वह पण्डितजी के कमरे में गया। बातें शुरू हो गई। रोज के अनुसार उसने नए-नए विषयों पर जानकारी ली और जाने लगा। तभी पंडितजी ने उसे पूछा, 'आपने जिऑलजी की पढ़ाई की है?' विस्मय से नाविक ने पूछा, 'जिऑलजी क्या है?' अब पंडितजी विस्मित हो गए। उन्होंने कहा, 'जिऑलजी यानि पृथ्वी के ज्ञान का शास्त्र।' नाविक ने कभी पाठशाला का रास्ता भी नहीं नापा था। बोला, 'महाराज ! मैं तो अक्षरशत्रु हूं,। मैंने किसी भी विषय की पढाई नहीं की है।' सुनकर पंडितजी बोले, 'दोस्त ! तुमने अपना एक चौथाई जीवन बेकार गंवाया है।' सुनकर नाविक दु:खी हो गया। दूसरे दिन रोज के अनुसार शाम को दोनों की बातें हुई, तभी पंडितजी ने पूछा, 'दोस्त! कम से कम ओशनोग्राफी तो तुमने पढ़ी ही होगी।' 'यह क्या है?' नाविक ने पूछा। 'यह समुद्र से संबंधित शास्त्र है।' पंडितजी बोले! 'मैंने तो नहीं पढ़ा।' नाविक ने उत्तर दिया। तब पंडितजी बोले, 'अच्छा? तब तो तुमने अपना आधा जीवन बेकार गंवाया।' नाविक और भी दु:खी हो गया। तीसरे दिन बड़ी शर्मिंदगी के साथ नाविक फिर पंडितजी के कमरे में गया। उसके मन में यही सवाल था कि आज पंडितजी क्या पूछेंगे? पंडितजी ने उस दिन उसे पूछा, 'कम से कम मीटिओरोलॉजी तो जरूर पढ़ी होगी, तुमने?'नाविक ने पूछा, 'यह क्या है? महाराज, मैंने तो आजतक यही शब्द सुना ही नहीं।' पंडितजी ने कहा, 'अरे, यह तो हवा, बारिश, हवामान की पढ़ाई है।' 'किंतु मुझे तो इसका बिलकुल ही ज्ञान नहीं।' नाविक ने उत्तर दिया। 'कमाल है। जिस धरती पर हम रहते हैं, उसके बारे में भी तुमने कुछ नहीं पढ़ा है? तब तो तुमने अपना तीन चौथाई जीवन बर्बाद किया है।' सुनकर नाविक और भी दु:खी हो गया। चौथा दिन आया। हवा जोरों से बहने लगी। बादल घिर आए। सागर की लहरों का उफान बढ़ने लगा। पंडितजी अपनी किताब खोलने वाले ही थे कि उतने में केबिन का दरवाजा खोलकर नाविक अंदर आया। उसने पंडितजी से पूछा, 'क्या आपने स्विमॉलॉजी पढ़ी है?' पंडितजी ने पूछा,'स्विमॉलॉजी क्या है?' 'सीधा सवाल है । क्या आपको तैरना आता है?' नाविक ने पूछा। पंडितजी ने सिर हिलाकर मना कर दिया तो नाविक बोल पड़ा, 'क्या कहते हैं? इतने बड़े-बड़े ग्रंथों की पढ़ाई करके भी आपको तैरना नहीं आता? तब तो महाराज, आपका पूरा जीवन बरबाद हो गया। क्योंकि हमारी नौका एक चट्टान से टकरा गई है उसके तल में छेद हो गया है। अब वही बच सकते हैं, जो तैरना जानते हैं।' तैरने की किताबें, कितनी ही पढ़ी हो, जब तक पानी में गिरते नहीं, तब तक तैरना नहीं आता। अनुभव से मिली हुई शिक्षा ही जीवन में काम आती है।
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