प्रात: स्नान की आवश्यकता क्यों?
प्रात: काल स्नान के पश्चात मनुष्य शुद्ध होकर जप, पूजा पाठ आदि समस्त कर्मों के योग्य बनता है, अत : स्नान की प्रशंसा की जाती है। नौ छिद्रों वाले अत्यंत मलिन शरीर से दिन रात मल निकलता रहता है। अत: प्रात: काल स्नान करने से शरीर की शुद्धि हो जाती है।
प्रात: स्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्कंर हि तत्।
सर्वमर्हति शुद्धात्मा प्रात: स्नायी जपादिकम्।।
प्रात: स्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्कंर हि तत्।
सर्वमर्हति शुद्धात्मा प्रात: स्नायी जपादिकम्।।
अत्यन्तमलिन: कायो नमच्छिद्रसमन्वित: ।
स्त्रवत्येष दिवारात्रौ प्रात: स्नानं विशोधनम्।।
स्त्रवत्येष दिवारात्रौ प्रात: स्नानं विशोधनम्।।
शुद्ध तीर्थ में प्रात: काल स्नान करना चाहिए, क्योंकि यह मलपूर्ण शरीर शुद्ध तीर्थ स्नान करने से शुद्ध होता है। प्रात: काल स्नान करने वाले के पास दुष्ट नहीं आते। इस प्रकार दृष्टफल शरीर की स्वच्छता, अदृष्टफल- पापनाशक तथा पुन्य की प्राप्ति- ये दोनों प्रकार के फल मिलते हैं अत: प्रात: स्नान करना चाहिए।
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