"बेगमों के बाग"
एक दिन बादशाह जंगल में शिकार खेलने के लिए जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक जंगली औरत के लड़का पैदा होते देखा। वह औरत लड़का जनते ही उसे टोकरे में रखकर अपने सिर पर उठज्ञकर खुशी-खुशी गांव को चली गई। बादशाह ने उसको ऐसा करते देख मन में विचार किया कि आखिर यह भी एक औरत ही है। फिश्र हमारी बेगमें जब बच्चे को जन्म देती हैं तो इतने नखरे क्यों दिखाती हैं?बादशाह का मन बेगमों की तरफ से फिर गया और उसी दिन से उन्होंने बेगमों से बोलचाल बंद कर दी।
बेगमें बादशाह की इस नाराजगी से बहुत घबरा गईं। अब उन्हें लाचार होकर बीरबल की शरण में जाना पड़ा। बीरबल ने उन्हें उनका दूःख दूर करने का वचन दिया और बोला-‘‘बागबानों से बाग सींचने को मना कर दो।’’
बेगमों ने वैसा ही किया। चन्द दिनों में ही पानी के अभाव में बाग के सारे पौधे पुरझा गए। यह देखकर बादशाह बहुत क्रोधित हुए। बादशाह ने बेगमों से पूछा-‘‘बाग सींचने की मनाही क्यों की गई और किसने की?’’
बेगमें बोलीं-‘‘स्वामी! हमारी आज्ञा से मालियों ने बाग सीचना बंद किया था। हम लोगों ने विचार किया कि जब जंगल के पेड़-पौधे बिना सींचे ही हरे-भरे रहते हैं तो इस बाग के पेड़ों को सींचने की क्या आवश्यकता है?’’
बादशाह बेगमों की मंशा ताड़कर चुप रह गए। बेगमों के प्रति उनके दिल का मलाल भी जाता रहा।
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