दुइयो कौर हो ,लेकिन हो ,,, डा• अवधेश दूबे
एक्चुअली भतहा हैं हम,, भात खाने वाले ,,,,,,,
.
पूर्वांचली क्षेत्रों में चावल की भरपूर फसल ने ही भात का मीठा स्वाद जीभ को लगा दिया होगा,,छीपा में चाहे कुच्छो हो ,, पर भात के बिना ओरिजिनल डकार नही आती ,,
दुइयो कौर हो ,लेकिन हो ,,,
छीपा में करीने से परोसने का रिवाज़ भी है ,,
इधर देखते हैं की प्लेट में भात ,ऊपर से दाल पसार दिया ,, यार ये खा रहे हो की भकोस रहे हो ,, ??
.
खैर ,, तो भात में करीने से परोसने का रिवाज़ है ,, आधी थाली में भात को जाँत के उसके एक किनारे थोडा दबा के चोखा अँचार रखने की जगह बनाई जाती है ,, उसी भात के बने हुए बरहम बाबा के ऊपर तवा पे भूंजा हुआ नमक वाली मरिचायि ,,,
छीपा के बचे हुए आधे हिस्से में दाल जिसमे खराया हुआ घीव एक चमच उतराया दीखता है ,, ,
बाकि तर तकारी दही भुजिया फरका प्लेट में रख के आएगा ,,
लेकिन उसके पहले लोटा और पानी का गिलास आएगा ,, और उसके भी पहले वो जगह पियरी माटी से लीपी जाती है ,, जहाँ खाना है ,, फिर कम्बल या बेटसीट चपोत के बिछाया जायेगा ,, ,,
फिर माँ ,मेहरारू या बहन ,, जो भी हो ,, हाथ में बेना(हाथ वाला पंखा) झलती रहती हैं ,,
और देखते भी रहेंगी की थाली में कुछ कम हो गया है ,तो झट से ला कर परोस दें ,,
जूता चपल फरका ही खोलना पड़ता है ,,,
,
भतवान टाइप कोई आयोजन हो तो पांत में पत्तल पे भात को खाने वाला भी सहयोग करता है ,, खुद ही भात पिंड को बरहम बाबा जैसा बना के उसके मस्तक पर गड्ढा कर देता है ,, ताकि उसमें दाल डाली जा सके ,,
पत्तल पे भात दाल खाना ,, और उसमे से दाल बाहर न फैले ,, ये भी एक कला है ,, जो बचपन से बड़े बुजुर्ग आने वाली पीढ़ी को देते जाते हैं ,,
पर एक बात है ,,
यदि आपका छीपा/पत्तल अब खाली है,और खाना नही,तो पांत में बैठे अन्य लोगों से पहले नही उठ सकते ,,
अकेले खा रहे हैं तो अलग बात है ,,,
भात परोसने का एक अलग डिज़ाइन एक मित्र की सुसराल में देखे थे ,
बहुत अच्छा लगा था ,,
थाली के बीचो बीच भात से एक मेड बना कर एक तरफ दाल,,, दूसरी तरफ अँचार,चटनी,चोखा,भुंजलका मरिचा ,,
इंजीनियरी ऐसी की दाल का चोखा चटनी अँचार का कोई भेंट नही है छीपा में ,,
उनका तो पेट में जाने के बाद ही भेंट होगा ,, घर में मेहरारू को कई बार बोले भी ,, की वइसहीं परोस के दो ,, देख के भी अच्छा लगता है ,,
महटिया गयी ,, आप भी दिल्ली से ना जाने क्या क्या सीख के आ जाते हैं ,,
2/3 बार बोल के चुप हो गए हम ,,
,
,, भकोसना ही तो है ,,
खाना कहाँ है ,,,
भकोसना है ,,
एक्चुअली भतहा हैं हम,, भात खाने वाले ,,,,,,,
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पूर्वांचली क्षेत्रों में चावल की भरपूर फसल ने ही भात का मीठा स्वाद जीभ को लगा दिया होगा,,छीपा में चाहे कुच्छो हो ,, पर भात के बिना ओरिजिनल डकार नही आती ,,
दुइयो कौर हो ,लेकिन हो ,,,
छीपा में करीने से परोसने का रिवाज़ भी है ,,
इधर देखते हैं की प्लेट में भात ,ऊपर से दाल पसार दिया ,, यार ये खा रहे हो की भकोस रहे हो ,, ??
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खैर ,, तो भात में करीने से परोसने का रिवाज़ है ,, आधी थाली में भात को जाँत के उसके एक किनारे थोडा दबा के चोखा अँचार रखने की जगह बनाई जाती है ,, उसी भात के बने हुए बरहम बाबा के ऊपर तवा पे भूंजा हुआ नमक वाली मरिचायि ,,,
छीपा के बचे हुए आधे हिस्से में दाल जिसमे खराया हुआ घीव एक चमच उतराया दीखता है ,, ,
बाकि तर तकारी दही भुजिया फरका प्लेट में रख के आएगा ,,
लेकिन उसके पहले लोटा और पानी का गिलास आएगा ,, और उसके भी पहले वो जगह पियरी माटी से लीपी जाती है ,, जहाँ खाना है ,, फिर कम्बल या बेटसीट चपोत के बिछाया जायेगा ,, ,,
फिर माँ ,मेहरारू या बहन ,, जो भी हो ,, हाथ में बेना(हाथ वाला पंखा) झलती रहती हैं ,,
और देखते भी रहेंगी की थाली में कुछ कम हो गया है ,तो झट से ला कर परोस दें ,,
जूता चपल फरका ही खोलना पड़ता है ,,,
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भतवान टाइप कोई आयोजन हो तो पांत में पत्तल पे भात को खाने वाला भी सहयोग करता है ,, खुद ही भात पिंड को बरहम बाबा जैसा बना के उसके मस्तक पर गड्ढा कर देता है ,, ताकि उसमें दाल डाली जा सके ,,
पत्तल पे भात दाल खाना ,, और उसमे से दाल बाहर न फैले ,, ये भी एक कला है ,, जो बचपन से बड़े बुजुर्ग आने वाली पीढ़ी को देते जाते हैं ,,
पर एक बात है ,,
यदि आपका छीपा/पत्तल अब खाली है,और खाना नही,तो पांत में बैठे अन्य लोगों से पहले नही उठ सकते ,,
अकेले खा रहे हैं तो अलग बात है ,,,
भात परोसने का एक अलग डिज़ाइन एक मित्र की सुसराल में देखे थे ,
बहुत अच्छा लगा था ,,
थाली के बीचो बीच भात से एक मेड बना कर एक तरफ दाल,,, दूसरी तरफ अँचार,चटनी,चोखा,भुंजलका मरिचा ,,
इंजीनियरी ऐसी की दाल का चोखा चटनी अँचार का कोई भेंट नही है छीपा में ,,
उनका तो पेट में जाने के बाद ही भेंट होगा ,, घर में मेहरारू को कई बार बोले भी ,, की वइसहीं परोस के दो ,, देख के भी अच्छा लगता है ,,
महटिया गयी ,, आप भी दिल्ली से ना जाने क्या क्या सीख के आ जाते हैं ,,
2/3 बार बोल के चुप हो गए हम ,,
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,, भकोसना ही तो है ,,
खाना कहाँ है ,,,
भकोसना है ,,
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