Monday, 26 June 2017

जब महात्मा ने जिज्ञासु को अमल की महिमा बताई


जब महात्मा ने जिज्ञासु को अमल की महिमा बताई 
एक जिज्ञासु के मन में कई तरह के प्रश्न उठते थे। जिनके समाधान के लिए वह कभी संत-महात्मा के पास जाया करता था। हालांकि वह स्वयं अत्यंत ज्ञानी था किन्तु अपने प्रश्नों का उत्तर दूसरों से प्राप्त करना उसकी प्रवृत्ति थी। इसके बिना उसे चैन नहीं मिलता था। एक दिन उसके शहर में एक महात्मा आए। उस जिज्ञासु ने लोगों से उनके विषय में जानकारी प्राप्त की तो उसे ज्ञात हुआ कि वे बहुत ज्ञानी हैं। बस यह जानकार वह जिज्ञासु महात्मा के पास पहुंच गया और कुछ उपदेश सुनाने की प्रार्थना की। महात्मा ने उसे गौर से देखा और कहा- मेरा उपदेश यह है कि आज के बाद किसी से उपदेश मत मांगना। यह सुनकर वह व्यक्ति असमंजस में पड़ गया और सोचने लगा। तब महात्मा ने प्रश्न किया:-
महात्मा - अच्छा बताओ, सच बोलना अच्छा है या बुरा?
जिज्ञासु - अच्छा।
महात्मा - चोरी करना ठीक है या गलत?
जिज्ञासु - गलत।
महात्मा - समय का सदुपयोग करना चाहिए अथवा नहीं?
जिज्ञासु - करना चाहिए।
इस प्रकार के कई प्रश्न महात्मा ने जिज्ञासु से किए और सभी के उत्तर उसने सही दिए। तब महात्मा बोले-तुम सब कुछ जानते हो। अब और क्या उपदेश जानना सुनना चाहते हो? तुम्हें गुणों का ज्ञान है, किन्तु मात्र ज्ञान से काम नहीं चलता। गुणों को जीवन में उतारो। उन पर अमल करो। इसी में तुम्हारी भलाई है, उपदेश सुनने में नहीं।
सार यह है कि हम सत्य-असत्य के विषय में जानते हैं। जानना ज्ञान है और करना आचरण, अतः सत्य को जानने के बाद अपने आचरण का अंग बना लेने पर किसी उपदेश या गुरु की आवश्यकता नहीं होती।

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