Friday, 2 December 2016

विषाद की कुछ कविताएँ

विषाद की कुछ कविताएँ


दुख वही पुराना था 
उसे नयी भाषा में कैसे कहता
पुरानी भाषा में ही 
निहारता रहा अपना हारा मन।
हाथ में किरचें समेटे 
चलता रहा भीड़ में
किसी ने नहीं पूछा 
मैं इतना अकेला क्यों हूँ
किसी ने नहीं पूछा 
मेरी खामोशी का सबब।
जब लोग युग का नया मुहावरा रच रहे थे
मैं समेट रहा था अपना आदिम दुख
चौंक गया एक दिन मैं यह देख कर 
मेरी आँखों में कितने पुराने आंसू थे!

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