गीता मानव मात्र का धर्मशास्त्र है।🌺
महर्षि वेदव्यासश्रीकृष्ण कालीन महर्षि वेदव्यास से पूर्व कोई भी शास्त्र पुस्तक के रुप में उपलब्ध नहीं था। श्रुतज्ञान की इस परम्परा को तोड़ते हुए उन्होंने चार वेद, ब्रह्मसूत्र, महाभारत, भागवत एवं गीता-जैसे ग्रन्थों में पूर्वसंचित भौतिक एंव आध्यात्मिक ज्ञानराशि को संकलित कर अन्त में स्वयं ही निर्णय दिया कि-
या स्वयं पद्ननाभस्य मुखपद्नाद्मिनि: सृता।
गीता भलि प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो भगवान के श्रीमुख से नि: सृत वाणी है; फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता? मानव- सृत अविनाशी योग अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता, जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद् हैं, विस्मृति आ जाने पर उसी आदिशास्त्र को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुन: प्रकाशित किया, जिसकी यथावत् व्याख्या वेद और उपनिषद् हैं, विस्मृति आ जाने पर उसी आदिशास्त्र को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुन: प्रकाशित किया, जिसकी यथावत् व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ है।
‘गीता’ का सारांश इस श्लोक से प्रकट होता है-
‘गीता’ का सारांश इस श्लोक से प्रकट होता है-
एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम्
एको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।
एको देवो देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।
अर्थात एक ही शास्त्र है जो देवकीपुत्र भगवान ने श्रीमुख ने गायन किया- गीता! एक ही प्राप्त करने योग्य देव है। उस गायन में जो सत्य बताया-आत्मा! सिवाय आत्मा के कुछ भी शाशवत नहीं है। उस गायन में उन महायोगेश्वर ने क्या जपने के लिये कहा? ओम् अक्षय परमात्मा का नाम है, उसका जप कर और ध्यान मेरा धर। एक ही कर्म है गीता में वर्णित परमदेव एक परमात्मा की सेवा। उन्हें श्रद्धा से अपने हृदय में धारण करें। अस्तु, आरम्भ से ही गीता आपका शास्त्र रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के हजारों वर्ष पश्चात् परवर्ती जिन महापुरुषों ने एक ईश्वर को सत्य बताया, गीता के ही सन्देशवाहक हैं। ईश्वर से ही लौकिक एवं पारलौकिक सुखों की कामना, ईश्वर से डरना, अन्य किसी को ईश्वर न मानना- यहां तक तो सभी महापुरुषों ने बताया; किन्तु ईश्वरीय साधना, ईश्वर तक की दूरी तय करना- यह केवल गीता में ही सांगोपांग क्रमबद्ध सुरक्षित है। गीता से सुख- शान्ति तो मिलती ही है, यह अक्षय अनामय पद भी देती है।
No comments:
Post a Comment