Saturday, 26 November 2016

वृद्धा का झूठा आम

जब बुद्ध ने वृद्धा का झूठा आम स्वीकार किया
मगध की राजधानी में भगवान बुद्ध के प्रवचन सुनने भारी तादाद में लोग जुटते और उनके अमृत वचनों से लाभान्वित होते। थोड़े दिनों बाद बुद्ध ने अगले शहर जाने का विचार किया। अगले दिन के प्रवचन की समाप्ति कर बुद्ध ने वहां से जाने की घोषणा कर दी। यह सुनकर नगरवासी दुखी हो गए और उनसे कुछ दिन और रूकने का आग्रह किया, किंतु बुद्ध ने उनसे क्षमा मांगते हुए इसे अस्वीकार कर दिया। नगरवासियों की इच्छा थी कि बुद्ध को कुछ न कुछ भेंट दें। बुद्ध अगले दिन अपने आसन पर विराजित हुए और भेंट देने का क्रम आरंभ हुआ। जो भी भेंट आती, बुद्ध अपने शिष्यों से कहकर एक ओर रखवा देते। तभी एक गरीब वृद्धा खा चुके आधे आम को लेकर आई और बुद्ध के चरणों में वह झूठा आम रखकर बोली-भगवन्! मेरे पास यही मेरी समस्त पूंजी है। मैं धन्य होऊंगी, यदि आप इसे स्वीकार करेंगे। बुद्ध ने बड़े प्रेम से उस आम को उठा लिया। नगरवासियों ने पूछा-भगवन!इस आम में ऐसा क्या था कि उसे आपने स्व्यं उठकर ग्रहण किया? जब कि हमारे बहुमूल्य उपहार एक ओर रखवा दिए। तब बुद्ध बोले- वृद्धा के पास जितनी भी पूंजी थी, वह उसने अपने पेट की चिंता किए बगैर मुझे प्यार और श्रद्धा से अर्पित कर दी, जब कि तुम लोगों ने अंहकार से अपने धन का कुछ ही हिस्सा भेंट किया। तुम्हारे और वृद्धा के दान देने में अंहकार और श्रद्धा का भेद है।
आशय यह है कि श्रद्धा सहित किया गया दान दाता व याचक दोनों की आत्मा को तृप्त करता है, जब कि दान में अभिमान शामिल होने पर वह मात्र आवश्यकता को ही संतुष्ट कर पाता है।

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