शिव जी के सेवक भैरव जी की उत्पत्ति की कथा
शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के कारण भगवान् शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अन्य एक कथा के अनुसार एक बार जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने शिव तथा उन के गणों की रूपसज्जा को देख कर अपमान जनक वचन कहे। परन्तु भगवान् शिव ने उस वाचन पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु शिव के शारीर से एक प्रचंड काया का प्राकट्य हुआ तथा वो ब्रह्मा जी को मरने हेतु उद्धत हो आगे बड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो गए। अंततः शिव जी द्वारा मध्यस्थता करने के कारण वो क्रोधित तथा विकराल रूप वाला गण शांत हुआ। तदनंतर, भगवान् शिव ने उस गण को अपने आराधना स्थल काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया, तथा काल भैरव जी का भव्य महत्त्वपूर्ण मंदिर विद्यमान हैं। मार्गशीर्ष मास की कृष्णा अष्टमी के दिन इनका प्राकट्य हुआ था, परिणामस्वरूप यह तिथि काल-भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। विशेषकर मृत्यु भय से मुक्ति पाने हेतु इनकी आराधना की जाती हैं, परन्तु ये सर्व प्रकार के कामनाओ को पूर्ण करने में समर्थ हैं। समस्त प्रकार के अभिलाषित भोग तथा अलौकिक शक्तियां प्रदान करने में समर्थ हैं। भारत के भैरव मंदिरों में काशी के काल भैरव मंदिर तथा उज्जैन के बटुक भैरव मंदिर मुख्य माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोडाखाल में बटुक भैरव, जिन्हें गोलू देवता के नाम से जाना जाता हैं तथा विख्यात हैं।
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