मानस पूजा
वस्तुत: भगवान् को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं। संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर की पूजा की जा सके। इसलिये पुराणों में मानस पूजा का विशेष महत्व माना गया है। मानस पूजा में भक्त अपने इष्ट देव को मुक्तामणियों से मण्डित कर स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान कराता है। स्वर्ग लोक की मन्दाकिनी गङ्गा के जल से अपने आराध्य को स्नान कराता है, कामधेनु गौके दुग्ध से पंचामृत का निर्माण करता है। वस्त्राभूषण भी दिव्य अलौकिक होते हैं। पृथ्वीरुपी का गन्ध का अनुलेपन करता है। अपने आराध्य के लिये कुबेर की पुष्पवाटिका से स्वर्ण कमल पुष्पों का चयन करता है। भावना से वायुरुपी धूप, अग्निरुपी दीपक तथा अमृतरुपी नैवेघ भगवान को अर्पण करने की विधि है। इसके साथ ही त्रिलोक की सम्पूर्ण वस्तु सभी उपचार सच्चिदानन्दघन परमात्म- प्रभु के चरणों में भावना से भक्त अर्पण करने की विधि है। यह मानस पूजा का स्वरुप।
'कृत्वादौ मानसीं पूजां ततः पूजां समाचरेत।'
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