Sunday, 27 November 2016

श्रावण मास में की जाने वाली भगवान शिव की लक्षपूजा का वर्णन

श्रावण मास में की जाने वाली भगवान शिव की लक्षपूजा का वर्णन 🌸🌸🌸🌹🌹🌹🌹🌹


जो बुद्धिमान नत्तव्रत के द्वारा श्रावण मास को व्यतीत करता है, वह बारह महीने नत्तव्रत करने के फल का भागी होता है। दिन की समाप्ति के पूर्व जो रात्री का भोजन होता है , वही नत्तभोजन है। उसमें आदि की तीन घड़ियों को छोड़कर नत्तभोजन का समय होता है। सूर्य के अस्त होने के पश्चात तीन घड़ी सन्ध्या-काल होता है। सन्ध्यावेला में आहार , मैथुन , निद्रा और चौथा स्वाध्याय- इन चार कर्मों का त्याग कर देना चाहिये। सूर्य के मन्द पड़ जाने पर जब अपनी छाया अपने शरीर से दुगनी हो जाए, उस समय के भोजन को यति के लिये नत्तभोजन कहा गया है रात्रि- भोजन नत्तभोजन नहीं होता है। सूर्यास्त से लेकर नक्षत्र के दृष्टिगत होने तक के काल को विद्वानों ने गृहस्थ के लिये नत्त कहा है। यति के लिये दिन के आठवे भाग के शेष रहने पर भोजन का विधान है । उसके लिये रात्रि में भोजन का निषेध किया गया है। गृहस्थ को चाहिए कि वह विधी पूर्वक रात्री में नत्तभोजन करे और यति , विधवा तथा विधुर व्यक्ति सूर्य के रहते नत्तव्रत करें। विधुर व्यक्ति यदि पुत्रवान हो तब उसे भी रात्रि में ही नत्तव्रत करना चाहिये।अनाश्रमी हो अथवा आश्रमी हो अथवा पत्नीरहित हो अथवा पुत्रवान हो- उन्हें रात्रि में नत्तव्रत करना चाहिये। इस प्रकार बुद्धिमान मनुष्य को अपने अधिकार के अनुसार नत्तव्रत करना चाहिये। इस मास में नत्तव्रत करने वाला व्यक्ति परम गति प्राप्त करता है । बुद्धिमान व्यक्ति को श्रावण मास में प्रतिदिन नत्तव्रत करना चाहिये। ब्राह्मण के द्वारा अथवा स्वयं ही अतिरुद्र ,महारुद्र अथवा रुद्र मन्त्र से महीने भर प्रतिदिन अभिषेक करना चाहिये। अपने लिये जो भोज्य पदार्थ अथवा सुखोपभोग की वस्तु अतिप्रिय हो, संकल्प करके उन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रदान करके स्वयं महीने भर उन पदार्थो का त्याग करना चाहिये। लक्ष्मी चाहने वाले अथवा शान्ति की इच्छा वाले मनुष्य को लक्ष विल्वपत्रों से शिव की पूजा करनी चाहिये। शिव तथा विष्णु की प्रसन्नता तुलसी के दलों से सिद्ध होती है। बुरे स्वप्न की शान्ति के लिये धान्य से पूजन करना प्रशस्त होता है। देव के समक्ष निर्मित किये गये रंगवल्ली आदि से विभिन्न रंगों से रचित स्वस्तिक और चक्र आदि से प्रभु की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार सभी मनोरथों के लिये सभी प्रकार के पुष्पों से यदि मनुष्य लक्ष पूजा करे , तो शिव जी प्रसन्न होंगे। तत्पश्चात उद्यापन करना चाहिये। मण्डप-निर्माण करना चाहिये। उसके बीच में चावलों से सुन्दर कैलास का निर्माण करना चाहिये। उसके ऊपर ताँबे का अत्यन्त चमकीला तथा पंचपल्लव युक्त कलश स्थापित करना चाहिये। और उसे रेशमी वस्त्र से वेष्टित कर देना चाहिये। उसके ऊपर पार्वती पति शिवकी सुवर्णमय प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। तत्पश्चात पंचामृत पूर्वक धूप , दीप तथा नैवेघ से उस प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये और गीत , वाघ, नृत्य एंव वेद, शास्त्र तथा पुराणों के पाठ के द्वारा रात्रि में जागरण करना चाहिये। इसके बाद प्रातः काल भलीभाँति स्नान करके पवित्र हो जाना चाहिये और अपनी शाखा में निर्दिष्ट विधान के अनुसार वेदी का निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात मूलमन्त्र से या गायत्री मन्त्र से या शिव के सहस्त्र नामो के द्वारा तिल तथा घृतमिश्रित खीर से होम कराना चाहिये अथवा जिस मन्त्र से पूजा की गयी है, उसी से होम करना चाहिये। तदनन्तर शर्करा और घृत से मिश्रित चरु से आहुति डालनी चाहिये। तदनन्तर स्विष्टकृत होम करके पूर्णाहुति डालनी चाहिये। इसके बाद वस्त्र , अलंकार तथा भूषणों से भली भाँति आचार्य का पूजन करना चाहिये। श्रावण मास में इस प्रकार पूजन करने से भोले नाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होते है। 

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