जब कवि और धनिक के गुण- अवगुण बदल गए
एक शहर में निर्धन कवि और एक धनी मूर्ख रहते थे। कवि बहुत अच्छी कविता करता था। चारों ओर उसकी ख्याति भी थी, किंतु उसकी कविता उसे संपन्न नहीं बना पाई। जीवन के आभाव उसे बार-बार कचोटते और रह-रहकर अपनी निर्धनता का एहसास कराते। फलत: वह हमेशा दुखी रहता। दूसरी ओर धनी, संपन्नता के बावजूद यश के लिए तरसता। वह सोचता कि पैसा तो बहुत है किंतु समाज के मध्य वह कवि के समान सम्मान का पात्र नहीं है। धनी अपने मन में इच्छा करता कि संपन्नता भले न हो, किंतु चारों और वाहवाही हो और कवि सोचता कि ख्याति जाए पानी में, किंतु धन तो होना ही चाहिए। एक बार दोनों की कहीं भेंट हुई।
दोनों की बातचीत में अपने जीवन के प्रति असंतोष का स्वर ही सबसे ऊंचा था। उसी समय उधर से स्वर्ग का एक दूत निकला। उसने दोनों के कंधो पर हाथ रखा, हाथ रखते ही दोनों के गुण-अवगुण एक- दूसरे से बदल गए। दोनों विदा हुए किंतु विचित्र बात थी कि जब कवि ने आंखे खोलकर देखा तो उसे अपनें हाथों में सरकती हुई शुष्क रेत मिली और जब मूर्ख ने अपनी आंखे खोली तो उसे अपने आस-पास चलते-फिरते बादलों के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आया यानि जैसा चाहा वैसा पाकर भी उन्हें आत्मिक सुख और संतुष्टि का बोध नहीं हुआ। गूढ़ार्थ यह है कि जो लोग अपने जीवन में सदैव असंतुष्ट रहकर दूसरों का जीवन सुखमय मानते हैं, वे कभी प्रसन्न नहीं रह पाते क्यों कि असंतोष दुख का जनक है।
वस्तुत: मानव जीवन ईश्वर का वरदान है, जिसका उपयोग दूसरों से तुलना कर दुखी होने में नहीं, बल्कि सत्कार्यों के लिए करना चाहिए। यही सुख का वास्तविक आधार है।
दोनों की बातचीत में अपने जीवन के प्रति असंतोष का स्वर ही सबसे ऊंचा था। उसी समय उधर से स्वर्ग का एक दूत निकला। उसने दोनों के कंधो पर हाथ रखा, हाथ रखते ही दोनों के गुण-अवगुण एक- दूसरे से बदल गए। दोनों विदा हुए किंतु विचित्र बात थी कि जब कवि ने आंखे खोलकर देखा तो उसे अपनें हाथों में सरकती हुई शुष्क रेत मिली और जब मूर्ख ने अपनी आंखे खोली तो उसे अपने आस-पास चलते-फिरते बादलों के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आया यानि जैसा चाहा वैसा पाकर भी उन्हें आत्मिक सुख और संतुष्टि का बोध नहीं हुआ। गूढ़ार्थ यह है कि जो लोग अपने जीवन में सदैव असंतुष्ट रहकर दूसरों का जीवन सुखमय मानते हैं, वे कभी प्रसन्न नहीं रह पाते क्यों कि असंतोष दुख का जनक है।
वस्तुत: मानव जीवन ईश्वर का वरदान है, जिसका उपयोग दूसरों से तुलना कर दुखी होने में नहीं, बल्कि सत्कार्यों के लिए करना चाहिए। यही सुख का वास्तविक आधार है।
No comments:
Post a Comment