Saturday, 26 November 2016

महर्षि रमण


                                                                     

                                                                       महर्षि रमण


महर्षि रमण अपनी छोटी सी कुटिया में अत्यंत सादगी से रहते थे। न उन्होने किसी वस्तु का संग्रह किया था और न ही उन्हें किसी चीज की आवश्यकता महसूस होती थी। उनके शिष्य और भक्त उनसे प्राप्त ज्ञान के बदले कई बार कोई उपहारअपने मन से देना चाहते तो महर्षि उन्हे इंकार कर देते। इसी प्रकार जबरन आए या दिए हुए उपहारों को वे जरूरतमंदो में वितरित कर देते।निर्धनों व अशक्तों की सहायता करने की दिशा में वे सदैव तत्पर रहते थे और अपने शिष्यों को भी इसकी प्रेरणा दिया करते थे। महर्षि रमण अपने शरीर पर मात्र एक धोती धारण करते थे। इस एक धोती के अतिरिक्त कोई सांसारिक वस्तु उनके पास नहीं थी। एक दिन महर्षि की धोती फट गई। उन्हें लगा कि अभी धोती को सिलकर थोड़े समय इसी से काम चलाया जा सकता है। उन्होने कुटिया में सुई खोजी, किंतु उनके जैसे असंग्रहित के यहां सुई कैसे मिलती? अत: सुई के आभाव में उन्होने बबूल के कांटे से ही धोती की सिलाई शुरू कर दी। तभी उनका भक्त धीरजन उनके पास आया और उसने प्रार्थना की- महर्षि, इस धोती को फेंक दीजिए। मैं आपके लिए नई धोती ला देता हूं। महर्षि ने बड़ी गंभीरता से धीरजन को समझाया- देखो, सामने खड़ा बच्चा ठंड से ठिठुर रहा है, तुम उसके लिए कपड़ों की व्यवस्था कर दो। समझ लेना कि मैंने तुम्हारी धोती ले ली। मेंरी यह धोती तो अभी दो माह और चल जाएगी।
तात्पर्य यह है कि सच्चा संत वही है, जो इस जगत में विरक्त भाव से रहे और अपना सब कुछ दूसरों को देने के लिए सदैव तत्पर रहे।

No comments:

Post a Comment