Monday, 26 June 2017

मन को कभी भी निराश न होने दें

मन को कभी भी निराश न होने दें
सुबह-सुबह एक भिखारी एक सज्जन के घर पर भिक्षा मांगने के लिए पहुंच गया। भिखारी ने दरवाजा खटखटाया, सज्जन बाहर आये पर उनकी जेब में देने के लिए कुछ न निकला। वे कुछ दुखी होकर घर के अंदर गए और एक बर्तन उठाकर भिखारी को दे दिया।
भिखारी के जाने के थोड़ी देर बाद ही वहां सज्जन की पत्नी आई और बर्तन न पाकर चिल्लाने लगी अरे! क्या कर दिया आपने चांदी का बर्तन भिखारी को दे दिया। दौड़ो-दौड़ो और उसे वापिस लेकर आओ। सज्जन दौड़ते हुए गए और भिखारी को रोककर कहा “भाई मेरी पत्नी ने मुझे जानकारी दी है कि यह गिलास चांदी का है, कृपया इसे सस्ते में मत बेच दीजियेगा।”
वहीँ पर खड़े सज्जन के एक मित्र ने उससे पूछा- मित्र! जब आपको पता चल गया था कि ये गिलास चांदी का है तो भी उसे गिलास क्यों ले जाने दिया?”
सज्जन ने मुस्कुराते हुए कहा- “मन को इस बात का अभ्यस्त बनाने के लिए कि वह बड़ी से बड़ी हानि में भी कभी दुखी और निराश न हो

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